Bilkul Sateek News
Reporter: Pardeep Narula
Author: Pardeep Narula
गुरुग्राम: रात का सन्नाटा था… गली में रोज़ की तरह खामोशी पसरी हुई थी। लेकिन डूंडाहेड़ा की एक संकरी गली में अचानक ऐसा धमाका हुआ, जिसने नींद, सुकून और ज़िंदगी—तीनों को एक साथ तोड़ दिया।
देर रात एक पुराने मकान की छत अचानक भरभराकर गिर गई। मलबे का शोर इतना तेज़ था कि आसपास के लोग घबराकर घरों से बाहर निकल आए। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

नींद में ही दब गया सतीश
कमरे के अंदर मौजूद बिहार के औरंगाबाद निवासी सतीश माल्या उस वक्त बिस्तर पर लेटे हुए थे। उन्हें संभलने का एक पल भी नहीं मिला। छत सीधे उन पर आ गिरी और वह मलबे में दब गए। जब तक लोग उन्हें निकाल पाते, उनकी सांसें थम चुकी थीं।

खाना बनाते वक्त हादसा, खौलता तेल बना खतरा
उसी कमरे में उनका एक साथी खाना बना रहा था। छत गिरते ही भगदड़ मच गई और उसके ऊपर गर्म तेल गिर गया। वह गंभीर रूप से झुलस गया और दर्द से तड़पता रहा, जब तक कि लोग उसे बाहर नहीं निकाल पाए।
गुजरते दंपति भी चपेट में आए
हादसे की मार सिर्फ कमरे तक सीमित नहीं रही। मकान के बाहर से गुजर रहे एक पति-पत्नी भी इस गिरती छत और मलबे की चपेट में आ गए। दोनों को गंभीर चोटें आईं और उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया।
शुरू किया गया रेस्क्यू ऑपरेशन
जैसे ही घटना की सूचना मिली, पुलिस, फायर ब्रिगेड और सिविल डिफेंस की टीमें मौके पर पहुंचीं। अंधेरे और मलबे के बीच रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हुआ। मशीनों और हाथों की मदद से ईंट-पत्थर हटाए गए और लोगों को बाहर निकाला गया।
सतीश को बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घायलों को जल्दबाजी में अस्पताल पहुंचाया गया, जहां एक की हालत गंभीर होने पर उसे दिल्ली रेफर करना पड़ा।
“हमने पहले ही चेताया था” — परिवार का आरोप
मृतक के परिजनों का दर्द अब सवालों में बदल रहा है। उनका कहना है कि मकान की हालत पहले से खराब थी। छत में दरारें थीं, बारिश में पानी टपकता था और कई बार मकान मालिक को इस बारे में बताया गया था। लेकिन चेतावनियां अनसुनी रह गईं… और आखिरकार वही डर सच बन गया।
पुराना ढांचा या लापरवाही?
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि मकान काफी पुराना था और उसकी छत कमजोर हो चुकी थी। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि यह सिर्फ एक हादसा था या इसमें लापरवाही की भी भूमिका है। प्रशासन ने आसपास के मकानों की जांच के निर्देश दिए हैं, ताकि ऐसी कोई और छिपी हुई खतरे की दीवार समय रहते गिरने से पहले पहचान ली जाए।
हादसा पीछे छोड़ गया सवाल
यह हादसा सिर्फ एक खबर नहीं है… यह उन अनगिनत पुराने, थके हुए मकानों की कहानी है, जो शहरों में अब भी खड़े तो हैं, लेकिन कब गिर पड़ें—कोई नहीं जानता। एक जान जा चुकी है। तीन लोग अस्पताल में हैं। लेकिन क्या यह हादसा रोका जा सकता था?




