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Reporter: Pradeep Narula
Author: Pradeep Narula
गुरुग्राम, 18 फरवरी 2026
ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित सरस आजीविका मेला 2026 इन दिनों गुरुग्राम में रंग, स्वाद और परंपरा का जीवंत उत्सव बन गया है। देश के विभिन्न राज्यों से आए कारीगर अपने-अपने क्षेत्र की पारंपरिक कला, शुद्ध उत्पाद और सांस्कृतिक पहचान के साथ यहां जुटे हैं। मेले में बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के स्टॉल विशेष रूप से आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं, जहां हर वस्तु के पीछे मेहनत, विरासत और आत्मनिर्भरता की कहानी छिपी है।
बिहार से आया शुद्धता का स्वाद – पारंपरिक मखाना

बिहार से आईं गीता दीदी अपने स्टॉल पर पारंपरिक विधि से तैयार मखाने प्रस्तुत कर रही हैं। मखाना उत्पादन की प्रक्रिया अपने आप में रोचक है। तालाब में बीज डालने के लगभग छह महीने बाद तैयार बीजों को निकाला जाता है। इन्हें टोकरी में एकत्र कर साफ पानी से धोया और धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद रेत में गर्म कर लकड़ी से पीटने की पारंपरिक तकनीक से मखाने तैयार किए जाते हैं। यही प्रक्रिया इन्हें खास स्वाद और शुद्धता प्रदान करती है।
स्टॉल पर केवल सादा मखाना ही नहीं, बल्कि मसालेदार मखाना, चना का सत्तू, धनिया पाउडर, अदौरी पाउडर और मखाना पाउडर भी उपलब्ध हैं। सभी उत्पाद घरेलू और प्राकृतिक विधि से तैयार किए गए हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग इन उत्पादों में खास रुचि दिखा रहे हैं, जिससे इनकी मांग लगातार बढ़ रही है।
लाख की चूड़ियां – परंपरा और मजबूती का संगम
बिहार की सईदा खातून द्वारा प्रस्तुत लाख की चूड़ियां भी मेले में खास आकर्षण बनी हुई हैं। इन चूड़ियों के निर्माण में पश्चिम बंगाल और रांची से मंगवाई गई लाख का उपयोग किया जाता है। पहले लाख को भट्ठी में पिघलाया जाता है, फिर उसमें रंगीन पत्थरनुमा सजावटी तत्व मिलाए जाते हैं। इसके बाद मिश्रण को चूल्हे पर गर्म कर रस्सी के आकार में ढाला जाता है और कड़े के साइज में काटा जाता है। मजबूती के लिए इनमें तार डाली जाती है।
पारंपरिक तकनीक और हाथों की महीन कारीगरी से बनी ये चूड़ियां न केवल सुंदर हैं, बल्कि टिकाऊ भी हैं। महिलाओं के बीच इनकी लोकप्रियता साफ देखी जा सकती है। कई खरीदार इन्हें त्योहारों और शादियों के लिए पसंद कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक झलक
मेले में पश्चिम बंगाल का स्टॉल अपनी समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा के कारण विशेष आकर्षण बटोर रहा है। राज्य की कांथा कढ़ाई वाली साड़ियां, तांत और बालूचरी वस्त्र, टेराकोटा की मूर्तियां, शोला शिल्प, जूट से बने बैग और सजावटी सामान दर्शकों को खूब लुभा रहे हैं। डोकरा कला की धातु शिल्पकृतियां भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं।
इसके साथ ही बंगाल की प्रसिद्ध मिठाइयां जैसे रसगुल्ला और संदेश भी उपलब्ध हैं, जो स्वाद के साथ परंपरा की मिठास घोल रहे हैं। आगंतुक इन उत्पादों के माध्यम से बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को करीब से महसूस कर पा रहे हैं।
प्राकृतिक घास और खजूर से बने आकर्षक उत्पाद
मेले में गोल्डन घास और खजूर से बने हस्तशिल्प भी लोगों को अपनी ओर खींच रहे हैं। खजूर से बनी रोटी रखने की टोकरी, पत्तों से बनी सजावटी टोकरी जिन पर मोर की आकृति उकेरी गई है, तथा खजूर की छाल से बने रंगीन झुमके विशेष रूप से पसंद किए जा रहे हैं। ये उत्पाद न केवल पर्यावरण अनुकूल हैं, बल्कि ग्रामीण कारीगरों की रचनात्मकता का सजीव उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।
आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम
मेले में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं और ग्रामीण कारीगरों के हुनर की सराहना कर रहे हैं। यह आयोजन केवल खरीद-बिक्री का मंच नहीं, बल्कि महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए आत्मनिर्भर बनने का सशक्त अवसर भी है। यहां हर स्टॉल एक कहानी कहता है – मेहनत की, परंपरा की और नए सपनों की।
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