Bilkul Sateek News
Reporter: Pardeep Narula
Author: Pardeep Narula
गुरुग्राम: शहर में भारतीय शास्त्रीय संगीत और कथक नृत्य की खूबसूरती एक बार फिर जीवंत हो उठी, जब पं. भीमसेन जोशी संगीत अकादमी ने ‘स्वर कला संगम’ के सहयोग से 19 अप्रैल को अपना वार्षिक सांस्कृतिक महोत्सव ‘स्वरांजलि’ आयोजित किया। यह आयोजन भारत रत्न पं. भीमसेन जोशी को समर्पित रहा।

कार्यक्रम में सुर, ताल और भाव का ऐसा संगम देखने को मिला जिसने दर्शकों को एक भावनात्मक और सांगीतिक यात्रा पर ले गया। अकादमी के छात्र कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से अनुशासन, समर्पण और कला के प्रति गहरी समझ का परिचय दिया।
संस्थापक मुक्ता मोनिश मेहता और निदेशक मोनिश मेहता के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम में किराना घराने की परंपरा की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई दी। कार्यक्रम की गरिमा में तब और वृद्धि हुई जब उस्ताद अमजद अली खान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। डॉ. असीम आर. श्रीवास्तव और फ़रीद खान भी विशेष अतिथियों में शामिल थे।
शिव वंदना से शुरुआत, कथक ने बांधा समां: कार्यक्रम का आगाज़ वयस्क कथक कलाकारों की शिव वंदना से हुआ, जिसने पूरे माहौल को आध्यात्मिक बना दिया। इसके बाद छोटे बच्चों ने “ॐ नमः शिवाय” और “सुनो सुनो सांवरे” जैसी प्रस्तुतियों से दर्शकों का दिल जीत लिया।
रागों की रंगीन यात्रा: वोकल प्रस्तुतियों में देश, बिहाग, केदार, खमाज और बागेश्री जैसे रागों की खूबसूरत झलक देखने को मिली। वरिष्ठ कलाकारों ने राग भीमपालसी, पाटदीप और तिलक कामोद में अपनी परिपक्वता का प्रदर्शन किया।
15 वर्षीय चैतन्य शर्मा की एकल प्रस्तुति “निर्मोहीया हरजइया” कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रही।
कथक की ताल पर झूमता मंच: कार्यक्रम के दूसरे चरण में कथक की दमदार प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। धमार ताल, ठुमरी और “मुरशिद खेले होली” जैसी प्रस्तुतियों ने माहौल में रंग और ऊर्जा भर दी।
हर उम्र, एक मंच: ‘स्वरांजलि’ की खासियत इसकी समावेशिता रही, जहां चार साल के बच्चों से लेकर वयस्क कलाकारों तक सभी ने मंच साझा किया। यह कार्यक्रम केवल प्रस्तुति नहीं, बल्कि शास्त्रीय परंपरा को जीवित रखने का एक सशक्त प्रयास बनकर सामने आया।
कार्यक्रम के अंत तक यह स्पष्ट हो गया कि ‘स्वरांजलि’ महज़ एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय कला की जीवंत विरासत को आगे बढ़ाने का एक सुंदर माध्यम है।





