मानसून से पहले वैज्ञानिक मॉडलिंग, रियल-टाइम सेंसर और निर्णय-सहायक सिस्टम की होगी तैनाती
Bilkul Sateek News
गुरुग्राम, 30 जनवरी। हर साल मानसून में जलभराव से जूझ रहे गुरुग्राम के लिए अब एक विज्ञान-आधारित, तकनीकी और दीर्घकालिक समाधान की दिशा तय हो गई है। नगर निगम गुरुग्राम और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर के बीच एयरावत रिसर्च फाउंडेशन के तहत हुए समझौते के अनुसार शहर में “रेन-टू-रेज़िलिएंस” प्रणाली का पायलट चरण शुरू किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य बाढ़ की अग्रिम भविष्यवाणी, त्वरित प्रतिक्रिया और बेहतर शहरी योजना के लिए एकीकृत तकनीकी ढांचा तैयार करना है।
मानसून से पहले एक्शन प्लान
इस परियोजना का पहला चरण (0-12 माह) मानसून से पहले लागू किया जाएगा। इसमें आईआईटी गांधीनगर की मशीन इंटेलिजेंस एंड रेजिलिएंस (एमआईआर) लैब वैज्ञानिक मॉडलिंग, सिस्टम डिजाइन और तकनीकी सत्यापन का नेतृत्व करेगी। वहीं, आईआईटी गांधीनगर से इनक्यूबेटेड स्टार्टअप एयरएसक्यू क्लिमसोल प्राइवेट लिमिटेड परिचालन इंटरफेस, 3डी विज़ुअलाइजेशन और डैशबोर्ड विकसित करेगा। यह संरचना वैज्ञानिक कठोरता और व्यावहारिक उपयोगिता के संतुलन को सुनिश्चित करेगी।
शहर में लगेंगे स्मार्ट फ्लड सेंसर
परियोजना के तहत गुरुग्राम के संवेदनशील जलभराव स्थलों पर मेड-इन-इंडिया फ्लड-डेप्थ और ड्रेनेज-हेल्थ सेंसर लगाए जाएंगे। ये सेंसर जलस्तर, जलनिकासी की क्षमता, सिल्ट जमाव और रुकावटों की जानकारी देंगे। रियल-टाइम डेटा एक्वा ट्विन और रेन टू फ्लड प्लेटफॉर्म से जुड़कर बाढ़ की स्थिति का पूर्वानुमान लगाएगा। इससे नगर निगम को पहले से चेतावनी और स्थल-विशिष्ट कार्रवाई में मदद मिलेगी। यह सेंसर नेटवर्क भविष्य की शहरव्यापी विस्तार योजना की नींव भी बनेगा।
डेटा रहेगा भारत में, सुरक्षा सर्वाेच्च प्राथमिकता
परियोजना के तहत एक सख्त डेटा संप्रभुता नीति अपनाई गई है। सभी सेंसर डेटा भारत में ही सुरक्षित, एन्क्रिप्टेड सर्वरों पर संग्रहित होंगे और एमसीजी व आईआईटी गांधीनगर के नियंत्रण में रहेंगे। किसी विदेशी क्लाउड या बाहरी सर्वर का उपयोग नहीं किया जाएगा। यह व्यवस्था भारत के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून के अनुरूप है।
पायलट चरणः सॉफ्टवेयर मुफ्त, हार्डवेयर नगर निगम खरीदेगा
पहले 12 महीने के पायलट में एक्वा ट्विन और रेन टू फ्लड जैसे सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म नगर निगम को बिना लाइसेंस शुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे। सेंसर हार्डवेयर की अनुमानित लागत लगभग 1 लाख रुपये प्रति यूनिट है। पहले चरण में कुल हार्डवेयर खर्च लगभग 20 लाख रुपये आंका गया है। सभी उपकरण नगर निगम की संपत्ति होंगे। तकनीकी रखरखाव आईआईटी गांधीनगर की देखरेख में किया जाएगा।
दूसरे चरण में एसएएएस मॉडल पर विस्तार
पायलट सफल होने पर परियोजना का दूसरा चरण शुरू होगा, जिसमें शहर-व्यापी विस्तार, 24 गुणा 7 संचालन और उन्नत मॉडलिंग सेवाएं सॉफ्टवेयर-एज-ए-सर्विस (एसएएएस) मॉडल पर दी जाएंगी। संभावित वार्षिक खर्च लगभग 30 लाख रुपये होगा। यदि एमसीजी खुद सर्वर लगाना चाहे तो लागत 3 से 5 करोड़ रुपये तक जा सकती है। यह चरण गुरुग्राम को देश के अग्रणी डाटा-आधारित बाढ़ प्रबंधन मॉडल के रूप में स्थापित कर सकता है।
नगर निगम को मिलेंगे ये बड़े लाभ
इस परियोजना से एमसीजी को बाढ़ की शॉर्ट-टर्म भविष्यवाणी, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और डैशबोर्ड, संवेदनशील क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान, आपदा प्रबंधन और शहरी योजना में डाटा-आधारित निर्णय, इंजीनियरिंग स्टाफ की तकनीकी क्षमता में वृद्धि आदि बड़े लाभ मिलेंगे।
स्पष्ट जिम्मेदारी और पारदर्शिता
आईआईटी गांधीनगर वैज्ञानिक व तकनीकी मार्गदर्शन देगा, जबकि एयरएसक्यू केवल तकनीकी सेवा प्रदाता की भूमिका में रहेगा। सभी प्रशासनिक और आपदा-संबंधी निर्णय नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में होंगे। परियोजना से जुड़े संभावित हितों के टकराव को भी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया गया है।
“मेड इन इंडिया, डिजाइन्ड फॉर गुरुग्राम” सोच के साथ तैयार यह पहल गुरुग्राम को पारंपरिक जल निकासी मॉडल से आगे ले जाकर स्मार्ट, डेटा-ड्रिवन और रेजिलिएंट शहर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह पायलट सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में गुरुग्राम शहरी बाढ़ प्रबंधन का राष्ट्रीय उदाहरण बन सकता है।



