Bilkul Sateek News
फरीदाबाद (अजय वर्मा), 3 फरवरी। फरीदाबाद में लग रहे 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में लिपाई का काम करने आई भवंरी देवी का परिवार उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा है। मेले की मुख्य चौपाल के पास उनके बेटे और बहू ने पेड़ के नीचे स्टाल लगाया है। जहां पर वो राजाओं के समय प्रचलित कटपुतलियों सहित हाथों से बने वो उत्पाद लेकर आए है जो आज के नए दौर में पूरी तरह से खत्म हो चुके है।
राजस्थान के डीडवाना कुचामन के गांव भावता के रहने वाले 54 वर्षीय मदनलाल और 50 वर्षीय उनकी पत्नी गुलाब देवी साल 2015 से सूरजकुंड मेले में आ रही है। वो यहां पर हाथों से बनाकर बंदनवार, लड़ी, झूमर, हाथ से तैयार राजस्थानी गुडिया, गोटा एंब्रायडरी की चोली, कठपुतली और राजस्थानी साफा लेकर आए हैं। ये सभी वो उत्पाद है जो अब पूरी तरह से लुप्त हो चुके है। दोनों पति-पत्नी राजाओं के समय की कला को आज भी जिंदा रखे हुए है।
हस्तशिल्पी मदनलाल बताते है कि उनकी माता 1987 में पहली बार इस मेले में एक श्रमिक के तौर पर आई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल ने 1987 में सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले को शुरू करवाया था। मेला अरावली की पहाड़ियों की मनोरम छटा के बीच लगाया गया था। इसलिए इसे स्थायी निर्माण के बगैर पारंपरिक देहाती छाप देने का निर्णय लिया गया।
इसी में इसकी दीवारों को गोबर से लीपने का निर्णय लिया गया। ऐसे में मेले को पारंपरिक रूप देने के लिए कुछ महिला श्रमिकों को गोबर लिपाई के लिए बुलाया गया था। इन्हीं महिला श्रमिकों में उनकी मां भंवरी देवी आई थी। भंवरी देवी ने लिपाई का काम खत्म होने के बाद मेला अधिकारियों से आग्रह किया कि एक कोने में वह भी अपना कुछ सामान बेच सकती है। जिसके बाद परमिशन मिलने पर उन्होंने यहां पर अपनी दुकान लगाई। जिसके बाद से भंवरी देवी हर साल मेले में आती रही।
साल 2015 भंवरी देवी की मृत्यु हो गई तो परिवार ने उनकी परंपरा को निभाए रखा। आज उनकी पुत्रवधु गुलाब देवी उनकी परंपरा को निभा रही हैं। बड़ी चौपाल के अपने घर के सामने ही स्टाल लगाने वाली गुलाब देवी बताती हैं कि कसीदाकारी और गोटे का काम उन्होंने अपनी सास से ही सीखा है। बेटे मदनलाल मेघवाल का कहना है कि यह मेला अब उनके परिवार की परंपरा से जुड़ा है। वह यहां कमाई नहीं बल्कि अपनी मां की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पहुंचते हैं।
मदनलाल राजस्थान से आए कलाकार –
मेले में आने वाले लोगों को उनकी मां की समय की हाथ से चलने वाली आटा चक्की बेहद पसंद आ रही है। मेले में आने वाले लोगों का कहना है कि हाथ की आटा चक्की देखकर उनको अपनी पूर्वजों की याद आती है। ये लुप्त होती कला है जिसको जिंदा रखने का काम बेहद सहारनीय है।



