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फरीदाबाद (अजय वर्मा), 12 जनवरी। आमतौर पर धार्मिक स्थल आस्था और आराधना के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन फरीदाबाद के एनआईटी पांच नंबर में स्थित गुरुद्वारा शहीदाने गुजरात ट्रेन ऐसा ऐतिहासिक स्थल है जो भारत-पाक विभाजन के दौरान हुए भयानक कत्लेआम की याद दिलाता है और यहां आज भी 1948 में ट्रेन में हुए नरसंहार की कहानी सुनकर लोगों की रूह कांप जाती है।
भारत पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आते समय शहीद हुए 2600 निर्दोष हिंदू और सिख यात्रियों की स्मृति में इस गुरुद्वारे का निर्माण करवाया गया था और इस गुरुद्वारे का नाम गुरुद्वारा शहीदाने गुजरात ट्रेन रखा गया था। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 79 वां शहीदी दिवस श्रद्धा और भावुकता के साथ मनाया जा रहा है।
गुरुद्वारा शहीदाने गुजरात ट्रेन न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि देशभक्ति और बलिदान का जीवंत प्रतीक है। गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के अनुसार विभाजन के बाद हिंदू और सिख समाज के हजारों लोग पाकिस्तान में अपना घर पर छोड़कर भारत आ रहे थे और 10 जनवरी 1948 को पाकिस्तान के बन्नू शहर से एक ट्रेन भारत के लिए रवाना हुई। जिसमें लगभग 3600 हिंदू और सिख यात्री सवार थे और इस ट्रेन में यात्रियों की सुरक्षा के लिए आर्मी के जवान तैनात किए गए थे, लेकिन कबालियों द्वारा ट्रेन का रास्ता बदल दिया गया और 12 जनवरी 1948 को और ट्रेन पाकिस्तान के गुजरात स्टेशन पर पहुंची और जैसे ही ट्रेन रुकी पहले से ही घात लगाए बैठे मुसलमानों ने यात्रियों पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दी। ट्रेन में मौजूद आर्मी के जवानों ने गोली का जवाब गोली से दिया, लेकिन गोलियां खत्म होने पर हमलावर ट्रेन पर टूट पड़े और इस हमले में जहां आर्मी के जवान शहीद हो गए। वहीं महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों समेत 2600 लोग भी शहीद हो गए। इस ट्रेन में बचकर आए कुछ लोग फरीदाबाद में आकर बस गए और उन्होंने यहां शहीदों की याद में गुरुद्वारा शहीदाने गुजरात ट्रेन का निर्माण किया। तभी से यहां हर साल 12 जनवरी को शहीदों की याद में शहीदी दिवस मनाया जाता है l
इस ट्रेन कत्लेआम में बचे सुरेंद्र सिंह, भोला सिंह और तारा सिंह ने बताया कि उस समय उनकी उम्र 5 वर्ष थी जब उनके परिजन मारे गए और वह गंभीर रूप से घायल होते हुए भी बच गए। तभी उन्होंने फरीदाबाद में मिलकर इस गुरुद्वारे का निर्माण करवाया और हर साल यहां शहीदों की याद में तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।



