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Reporter: Sonu Rana
Author: Sonu Rana
नई दिल्ली।
दिल्ली के नरेला का नाम पहले ननेरा था, जो गलत उच्चारण की वजह से समय के साथ नरेला हो गया। यह जगह कभी दिल्ली के चार बड़े कस्बों (नरेला, नजफगढ़, नांगलोई और महरौली) में से एक थी। यहां युद्ध लड़े गए, व्यापार फला-फूला और एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी बनी। एक तरफ आज जहां यह इलाका अपनी पुरानी शान खोता नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर नरेला पूरी तरह बदल चुका है। पुरानी झोपड़ियां और सीमेंट की छतें अब मल्टीस्टोरी इमारतों में बदल गई हैं। सरकार अब इन पुराने इलाकों को फिर से विकसित करने की सोच रही है। राजाओं से लेकर अंग्रेजों तक सबने यहां अपना असर छोड़ा।

नरेला का इतिहास
नरेला का इतिहास 980 ईस्वी से शुरू होता है। उस समय यहां भज्जूखेड़ा नाम की बस्ती थी। लाहौर से आए जमींदार अखंड प्रताप सिंह के बेटे नरबीर सिंह (नोना) यहां आए। उन्होंने यहां के तालाब में नहाते हुए नानकी नाम की लड़की से मुलाकात की। बस्ती के प्रधान नानू ने दोनों का विवाह करवा दिया। नानू, नोना और नानकी के नाम मिलाकर इस जगह का नाम ननेरा रख दिया गया। जब यहां रेलवे स्टेशन बना तो उत्तर रेलवे के सुपरिंटेंडेंट जॉन क्रिस्टोफर ने इसका नाम ठीक से न समझ पाकर नरेलाह कर दिया। बाद में ‘ह’ अक्षर हट गया और नाम नरेला हो गया। हालांकि इतिहास को लेकर कुछ लोगों की राय अलग भी है।
युद्धों का साक्षी बना नरेला
नरेला कई बड़े युद्धों का गवाह रहा है। वर्ष 1757 में अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय यहां मराठा सेना और अब्दाली की टुकड़ी के बीच लड़ाई हुई। मराठा सरदार अंताजी मानकेश्वर ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन नजीबुद्दौला ने मुगल सम्राट के साथ विश्वासघात कर अब्दाली का साथ दिया। इस वजह से मराठों को नुकसान उठाना पड़ा और अब्दाली दिल्ली तक पहुंच गए।

एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी
अंग्रेजों के समय नरेला व्यापार का बड़ा केंद्र बन गया। उन्होंने रेल लाइन बिछाई और 1919 में यहां अनाज मंडी शुरू की। बाद में यह एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी के रूप में मशहूर हुई। यहां सरायें भी बनीं जहां देश-विदेश से आने वाले व्यापारी और सेनाएं रुकती थीं।

शिक्षा और तालाब की कहानी
1914 में लाला मुसद्दीलाल नाम के जमींदार यहां आए। उन्होंने तालाब के पास छोटे से स्कूल की शुरुआत की, जो बाद में मुसद्दीलाल सीनियर सेकंडरी स्कूल (एमएल स्कूल) बन गया। नरेला का पुराना तालाब भी खास है। इसे तोमर वंश के राजा चंद ने बनवाया था। यह 84 बीघा में फैला, 10 गज गहरा तालाब था। इसमें यमुना से नहर जोड़ी गई थी। 1998 में यहां क्रिकेट खेलते बच्चों को चांदी के पुराने सिक्के मिले, जो मुगल काल के थे।
गांधी और नेहरू भी आए यहां
महात्मा गांधी 1936 में नरेला आए और कई दिन रुके। उन्होंने यहां गांधी आश्रम बनाया। पंडित जवाहर लाल नेहरू भी दो बार यहां आए। एक बार यहां के एक रोड पर स्वागत के दौरान 11 हजार रुपये की थैली को लेकर विवाद हो गया। नेहरू नाराज होकर चले गए और जो विकास का प्लान नरेला के लिए था, वह दक्षिण दिल्ली में शिफ्ट कर दिया गया।




