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Reporter: Sonu Rana
Author: Sonu Rana
नई दिल्ली।
दिल्ली के नरेला का नाम पहले ननेरा था, जो गलत उच्चारण की वजह से समय के साथ नरेला हो गया। यह जगह कभी दिल्ली के चार बड़े कस्बों में से एक थी। यहां युद्ध लड़े गए, व्यापार फला-फूला और एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी बनी। एक तरफ आज जहां यह इलाका अपनी पुरानी शान खोता नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर नरेला पूरी तरह बदल चुका है। पुरानी झोपड़ियां और सीमेंट की छतें अब मल्टीस्टोरी इमारतों में बदल गई हैं। सरकार अब इन पुराने इलाकों को फिर से विकसित करने की सोच रही है। राजाओं से लेकर अंग्रेजों तक सबने यहां अपना असर छोड़ा।

नरेला का इतिहास
नरेला के इतिहास को लेकर अलग-अलग बातें कही जाती है। अलग-अलग समुदाय के लोग अपने पूर्वजों की बातों को सच बताते हैं। कुछ का कहना है कि सबसे पहले यहां पर भज्जूखेड़ा नाम की बस्ती थी। लाहौर के एक जमींदार के बेटे यहां आए। उन्होंने यहां एक लड़की से मुलाकात की। बस्ती के प्रधान ने दोनों का विवाह करवा दिया। प्रधान, लड़के व लड़की के नाम को मिलाकर इस जगह का नाम ननेरा रख दिया गया। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि अंग्रेजों की फौज में एक फौजी था। वह लाहौर का रहने वाला था। जब वह फौज से छुट्टी लेकर यहां से लाहौर जा रहा था तो उसको कस्बे के मुखिया की बेटी भैंस चराती हुई दिखी। भैंस भागने लगी तो फौजी ने उसे पकड़ा। मुखिया की बेटी उस फौजी पर मोहित हो गई। बाद में मुखिया ने अपनी बेटी का विवाह उस फौजी से करवा दिया। उनके पांच बेटे हुए। एक का नाम बांके, दूसरे का ननेरा, तीसरे का पपोसा आदि था। जब वह बड़े हुए तो उनके पिता ने उनके नाम पर जमीन कर दी। बाद में उसके नाम पर ही गांव का नाम रखा गया। एक गांव का नाम ननेरा, दूसरे का बांकनेर, मामूरपुर आदि नाम रखे गए। बाद में समय के साथ ननेरा को लोग नरेला बोलने लगे। हालांकि बुजुर्ग लोग अभी भी स्थानीय बोल चाल में ननेरा ही बोलते हैं।
युद्धों का साक्षी बना नरेला
नरेला कई बड़े युद्धों का गवाह रहा है। अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय यहां मराठा सेना और अब्दाली की टुकड़ी के बीच लड़ाई हुई। मराठा सरदार अंताजी मानकेश्वर ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन नजीबुद्दौला ने मुगल सम्राट के साथ विश्वासघात कर अब्दाली का साथ दिया। इस वजह से मराठों को नुकसान उठाना पड़ा और अब्दाली दिल्ली तक पहुंच गए।

एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी
अंग्रेजों के समय नरेला व्यापार का बड़ा केंद्र बन गया। उन्होंने रेल लाइन बिछाई और 1919 में यहां अनाज मंडी शुरू की। बाद में यह एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी के रूप में मशहूर हुई।

तालाब में आता था यमुना का पानी
नरेला का पुराना तालाब भी खास है। इसे तोमर वंश के राजा चंद ने बनवाया था। यह 84 बीघा में फैला, 10 गज गहरा तालाब था। इसमें यमुना से नहर जोड़ी गई थी।
गांधी और नेहरू भी आए यहां
महात्मा गांधी 1936 में नरेला आए और कई दिन रुके। उन्होंने यहां गांधी आश्रम बनाया। पंडित जवाहर लाल नेहरू भी दो बार यहां आए। एक बार यहां के एक रोड पर स्वागत के दौरान पैसों की थैली को लेकर विवाद हो गया। नेहरू नाराज होकर चले गए और जो विकास का प्लान नरेला के लिए था, वह दक्षिण दिल्ली में शिफ्ट कर दिया गया।
